Inter Arts History Chapter 1 All Questions -Answer 2027

Inter Arts History Chapter 1 All Questions -Answer 2027

1. निम्नलिखित प्रश्न संख्या 1 से 25 तक एक ही विकल्प सही है। प्रत्येक प्रश्न से सही उत्तर को दिए गए चार विकल्पों में से चुनें। 25×1=25

1. राखाल दास बनर्जी को मोहनजोदड़ो के अवशेष किस वर्ष मिले ?

(A) 1920 ई० में (B) 1921 ई० में (C) 1922 ई० में (D) 1923 ई० में

2. सिन्धुघाटी सभ्यता में विशाल स्नानागार के अवशेष कहाँ से प्राप्त हुए?

(A) हड़प्पा (B) मोहनजोदड़ो (C) कालीबंगा (D) लोथल

3. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना किसने की ?

(A) देवराय प्रथम (B) हरिहर और बुक्का (C) कृष्णदेवराय (D) सदाशिवराय

4. प्रयाग प्रशस्ति की रचना किसने की थी ?

(A) बाणभट्ट (B) कालीदास (C) हरिसेन (D) कौटिल्य

5. महावीर ने पार्श्वनाथ के सिद्धांतों में नया सिद्धांत क्या जोड़ा ?

(A) अहिंसा (B) ब्रह्मचर्य (C) सत्य (D) वेदव्यास

6. महाभारत की रचना किसने की ?

(A) वाल्मिकी (B) मनु (C) याज्ञवल्क्य (D) अपरिग्रह

7. किस भारतीय शासक को नेपोलियन की संज्ञा दी गई है?

(A) चन्द्रगुप्त मौर्य (B) समुद्रगुप्त (C) कनिष्क (D) हर्षवर्द्धन

8. सोलह महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली महाजनपद कौन था?

(A) मगध (B) अवन्ती  (C) कौशल (D) गांधार

9. इब्नबतूता किस देश का निवासी था?

(A) पुर्तगाल (B) मोरक्को (C) मिस्त्र (D) फ्रांस

10. कुतुबमीनार का निर्माण किसने शुरू किया ?

(A) इल्तुतमिश (B) जलालुद्दीन खिलजी  (C) कुतुबुद्दीन ऐबक  (D) रजिया

11. उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन का आरंभ किस संत ने किया ?

(A) रामानन्द (B) कबीर (C) चैतन्य (D) नानक

12. कैप्टन हाकिन्स किस मुगल शासक के दरबार में आया ?

(A) अकबर (B) जहाँगीर (C) औरंगजेब (D) शाहजहाँ

13. दीन-ए-इलाही किससे सम्वन्धित हैं?

(A) बाबर (B) हुमायूँ (C) अकबर (D) जहाँगीर

14. स्थापत्य कला का सबसे अधिक विकास किसके समय में हुआ?

(A) अकबर (B) जहाँगीर (C) शाहजहाँ (D) औरंगजेब

15. भारत का अंतिम मुगल शासक कौन था?

(A) शाहजहाँ (B) औरंगजेब (C) मुहम्मद शाह (D) बहादुर शाह जाफर

16. मुस्लिम लीग की स्थापना किस वर्ष हुई थी ?

(A) 1902 (B) 1906 (C) 1907 (D) 1919

17. ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना कब हुई ?

(A) 1600 ई० में (B) 1605 ई० में (C) 1610 ई० में (D) 1615 ई० में

18. 1920 ई० में कौन आंदोलन हुआ?

(A) खिलाफत (B) असहयोग (C) भारत छोड़ो (D) सविनय अवज्ञा

19. डाँडी किस राज्य में स्थित है?

(A) उत्तर प्रदेश (B) बिहार (C) महाराष्ट्र (D) गुजरात

20. पूना समझौता किस वर्ष हुआ?

(A) 1934 (B) 1932 (C) 1939 (D) 1942

21. दिल्ली चलो’ का नारा किसने दिया ?

(A) गाँधीजी (B) जवाहरलाल नेहरू (C) राजेन्द्र प्रसाद (D) सुभाषचन्द्र बोस

22. ‘काला कानून’ किसे कहा गया?

(A) रॉलेट ऐक्ट (B) इल्बर्ट बिल (C) वुड डिस्पैच (D) बंगाल प्रस्ताव

23. 1949 में कौन आंदोलन हुआ ?

(A) भारत छोड़ो (B) किसान (C) खिलाफत (D) सविनय अवज्ञा

24. भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे ?

(A) बी० आर० अम्बेडकर (B) सी० राजगोपालाचारी (C) सच्चिदानन्द सिन्हा (D) राजेन्द्र प्रसाद

25. भारतीय संविधान के अनुसार संप्रभुता निहित है

(A) राष्ट्रपति में (B) प्रधानमंत्री में (C) न्यायपालिका में (D) संविधान में

OBJECTIVE ANSWER Questuins 1 to 25

1-6-11-16-21-
2-7-12-17-22-
3-8-13-18-23-
4-9-14-19-24-
5-10-15-20-25-

भाग-II : (गैर-वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

खण्ड-‘ब’ (लघु उत्तरीय प्रश्न)

सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए। 10×3=30

1. इतिहास लेखन में अभिलेखों का क्या महत्त्व है?

Ans – अभिलेखों से तात्पर्य है पाषाण, धातु या मिट्टी के बर्तनों आदि पर खुदे हुए लेखाभिलेखों से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती है। अशोक के अभिलेखों द्वारा उसके धम्म, प्रचार-प्रसार के उपाय, प्रशासन, मानवीय पहलुओं आदि के विषय में सहज जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इतिहास लेखन में अभिलेख की महत्ता इससे भी स्पष्ट हो जाती है कि मात्र अभिलेखों के ही आधार पर भण्डारकर महोदय ने अशोक का इतिहास लिखने का सफल प्रयत्न किया है।

2. हड़प्पावासियों द्वारा व्यवहृत सिंचाई के साधनों का उल्लेख करें।

Ans – हड़प्पावासियों द्वारा मुख्यतः नहरें, कुएँ और जंल संग्रह करने वाले स्थानों को सिंचाई के रूप में प्रयोग में लाया जाता था। अफगानिस्तान में सौतुगई नामक स्थल से हड़प्पाई नहरों के चिह्न प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा के लोगों द्वारा सिंचाई के लिए कुओं का भी इस्तेमाल किया जाता था। गुजरात के धोलावीरा नामक स्थान से तालाब मिला है। इसे कृषि की सिंचाई के लिए पानी देने के लिए तथा जल संग्रह के लिए प्रयोग किया जाता था।

3. गौतम बुद्ध के प्रमुख उपदेशों का वर्णन करें।

Ans – बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन की बड़ी रानी मायादेवी के गर्भ से लुम्बिनी नामक स्थान पर 563 ई० पू० में हुआ था। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। राजकुमार सिद्धार्थ बचपन से ही अत्यंत दयालु, चिन्तनशील, कोमल स्वभाव के तथा एकान्तप्रिय थे। इस स्थिति को देखकर उनके पिता ने उनका विवाह यशोधरा नामक कन्या से करा दिया। कुछ समय के उपरांत उनका एक पुत्र पैदा लिया जिसका नाम राहुल था। परन्तु इनका मन भोग विलास में नहीं लगता था और एक दिन उन्होंने 29 वर्ष की अबस्था में घर छोड़ दिया। 6 वर्ष की घोर तपस्या के उपरांत उन्हें बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई, तब से वे गौतम बुद्ध कहलाने लगे। उन्होंने अपना पहला धार्मिक प्रवचन वाराणसी के निकट सारनाथ में दिया जिसे ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है। वे लगातार 45 वर्षों तक अपने धर्म का प्रचार करते रहे एवं समकालीन सभी राजा-महराजा उनके शिष्य बने।

4. मौर्यकालीन इतिहास के प्रमुख स्रोतों का संक्षिप्त विवरण दें।

Ans – मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी हेतु हमारे पास साहित्यिक एवं पुरातात्विक दोनों प्रकार के स्रोत हैं। साहित्यिक स्रोतों में कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मेगास्थनीज की इण्डिका विशाखदत्त की मुद्राराक्षस महत्त्वपूर्ण है तो पुरातात्विक स्रोतों में अशोक के शिलालेख, स्तंभलेख, कुम्हरार के अवशेष महत्त्वपूर्ण एवं विश्वसनीय जानकारी प्रदान करते हैं।

5. अशोक के धम्म का संक्षिप्त विवरण दें।

Ans – अशोक ने अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए कुछ सिद्धांत बनाये, इन सिद्धांतों को अशोक का धम्म कहा जाता है। अशोक का धम्म सभी धर्मों का सार संक्षेप था। अशोक के अभिलेख संख्या दो और पाँच के अनुसार, कम पाप, बहुत कल्याण, दया और दान ही धम्म है।

धम्म की विशेषताएँ-

(1) सार्वभौमिकता अशोक का धर्म एक सार्वभौमिक धर्म था क्योंकि इसमें सभी अच्छे गुणों का समावेश था जो सभी धर्मों में समान रूप से देखने को मिलता है। उसका धर्म विशेष धर्म न था किन्तु नैतिकता के सिद्धांतों का संग्रह मात्र था।

(2) अहिंसा: अहिंसा अशोक के धर्म की एक प्रमुख विशेषता थी, उसके धर्म में न केवल मनुष्यों वरन पशुओं की हत्या का भी निषेध था।

(3) सहिष्णुता : सहिष्णुता अशोक के धम्म की दूसरी प्रमुख विशेषता थी। वह सभी धर्मों का आदर करता था।

(4) नैतिकता : अशोक के धर्म की सबसे बड़ी विशेषता उसमें नैतिकता का पाया जाना था। इसी कारण उसे पवित्रता का नियम कहा जाता है। माता-पिता, गुरुजनों तथा वृद्धों की सेवा तथा समभाव की भावना पर बल दिया गया है।

6. विजयनगर की स्थापत्य कला की विशेषताओं का वर्णन करें।

Ans – विजयनगर स्थापत्य शैली में चोल, चालुक्य, पल्लव तथा होयसल शैली का शिक्षण मिलता है। विट्ठलस्वामी मंदिर वीरूपाक्ष मंदिर इस शैली के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। इनमें ग्रेफाइट पत्थरों के साथ-साथ शिल्पकला में सेलखड़ी पत्थरों का उपयोग किया गया है। स्तंभों को जानवरों तथा पौराणिक हिन्दू कथाओं से सजाया गया है। मण्डप चबूतरे पर बने हैं तथा मंदिरों में भव्य गोपुरम (प्रवेश द्वार) भी है।

7. अकबर की धार्मिक नीति की विवेचना करें।

Ans – शासन के प्रारंभ में अकबर कट्टर सुन्नी मुसलमान था वह इस्लाम धर्म के अनुसार अपना जीवन बिताता था, और सभी नियमों का पालन करता था। अकबर के माता-पिता, हिन्दू कन्याओं के साथ विवाह, भक्ति और सूफी आंदोलन के प्रभाव के कारण उसके विचारों में एक बहुत बड़ा बदलाव आया और वह एक उदार विचारों वाला व्यक्ति बन गया। उसने सब धर्मों के प्रति उदारता और सहनशीलता की नीति को अपनाया, सबके साथ समानता का व्यवहार किया और सबको धार्मिक स्वतंत्रता दी। अपनी इस नीति के अनुसार उसने हिन्दुओं पर लगे हुए अनुचित करों को हटा दिया, उनको मंदिर बनवाने और उनकी मरम्मत की आज्ञा दे दी, उनसे वैवाहिक संबंध स्थापित किए और उनको ऊँचे-ऊँचे सरकारी पदों पर नियुक्त किया। अकबर को अब इस बात का विश्वास हो गया था कि सभी धर्मों में सच्चाई और अच्छाइयाँ हैं।

8. स्थायी बन्दोबस्ती से कम्पनी को क्या लाभ हुए?

Ans – स्थायी बंदोवस्त से लाभ स्थायी बंदोवस्त से कंपनी और जमींदार दोनों लाभान्वित हुए। साथ ही, कृषि का विकास भी हुआ, परंतु किसानों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा।

(1) कंपनी की आय निश्चित होना कंपनी को प्रतिवर्ष होने वाली आय का अनुमान हो गया। इससे अस्थिरता की स्थिति समाप्त हो गयी। अधिक लगान की वसूली और इसमें होनेवाले कम खर्च से कंपनी की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गयी।

(2) जमींदार वर्ग का उदय इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप कंपनी और किसानों के मध्य बिचौलिए के रूप में एक जमींदार वर्ग का उदय हुआ। यह वर्ग अंग्रेजों का समर्थक बना रहा।
(3) जमींदारों को लाभ : स्थायी व्यवस्था से जमींदार लाभान्वित हुए। जमीन पर उनका पैतृक अधिकार हो गया। किसान उनके रैयत बन गये। वसूले गये लगान में हिस्सा मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई।

(4) कृषि का विकास : लगान निश्चित होने से किसान और जमींदार दोनों ने कृषि के विकास में रुचि ली।

9. 1857 के विद्रोह के मुख्य कारण क्या थे?

Ans – 1857 के विद्रोह के निम्नलिखित कारण थे- 1857 के विद्रोह भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इस घटना से भारतीयों में अंग्रेजों की नीति का विरोध करने का एक स्पष्ट मंच मिल गया। अंग्रेज नीति के कारण भारतीयों में असंतोष का वातावरण व्याप्त हो गया था।

इस विद्रोह के अनेक कारण निम्न है-

(i) राजनीतिक कारण (ii) डलहौजी की नीतियाँ (iii) प्रशासनिक कारण (iv) आर्थिक कारण (v) सामाजिक कारण (vi) धार्मिक कारण (vii) अंग्रेजों के प्रति अविश्वास की भावना (viii) अंग्रेजों की अजेयता में विश्वास कम होना (ix) सैनिक कारण एवं (x) विद्रोह का तात्कालिक कारण इत्यादि।

10. भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को क्यों लागू किया गया?

Ans – भारत का संविधान 26 नवम्बर, 1949 को बनकर तैयार हो गया था परंतु उसे 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। इसका एक कारण था कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के दिसम्बर 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता की माँग का प्रस्तान पास कराया था और 26 जनवरी, 1930 का दिन ‘प्रथम स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में आजादी से पूर्व ही मनाया गया था। इसके बाद काँग्रेस ने हर वर्ष 26 जनवरी का दिन इसी रूप में मनाया था। इसी पवित्र दिवस की याद ताजा रखने के लिए संविधान सभा ने 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू करने का निर्णय किया था।

खण्ड-‘स’ (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए। 5×6=30

11. हड़प्पा सभ्यता के पतन के प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।

Ans – हड़प्पा सभ्यता के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

(i) वाढ़ : हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख नगर नंदियों के किनारे बसे थे। जिनमें प्रतिवर्ष बाढ़ आती थी। बाढ़ से प्रतिवर्ष क्षति होती थी और वे मूल स्थान छोड़ अन्यत्र बसने को विवश हुए।

(ii) महामारी: मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों का परीक्षण के पश्चात यह निष्कर्ष निकला है कि सैंधव निवासी मलेरिया, महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के शिकार हुए। इन आकस्मिक बीमारियों ने उनके जीवन का अंत कर दिया होगा, जिसके परिणामस्वरूप सैंधव सभ्यता का पतन हो गया।

(iii) वाह्य आक्रमण पुरातात्विक स्रोतों से ज्ञात होता है कि सिंधुवासियों पर बाहरी आक्रमण हुये थे। वहाँ के लोगों को अत्यंत निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गयी थी।

(iv) जलवायु परिवर्तन प्रारंभ में सैंधव सभ्यता के क्षेत्रों में काफी वर्षा होती थी और घने जंगल थे। बाद में जंगलों को काटा गया, इससे जलवायु में परिवर्तन हुआ और नदियाँ सुख गयीं और सैंधव नगरों का विनाश हो गया।

अथवा, हड़प्पा सभ्यता के विस्तार की विवेचना करें।

Ans – हड़प्पा सभ्यता का उदय भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम भाग में हुआ था। रंगनाथ राव महोदय के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का विस्तार पूर्व से पश्चिम तक 1600 किमी एवं उत्तर से दक्षिण तक 1100 किमी है। यह सभ्यता उत्तर में कश्मीर के मांडा जिले से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक और पश्चिम में बुलचिस्तान के मकरान तट से उत्तर-पूर्व में मेरठ तक फैली हुई है। इसका क्षेत्रफल त्रिभुजाकार है और लगभग 1,299,600 वर्ग किलोमीटर में फैला है जो निश्चय ही पाकिस्तान अथवा प्राचीन मिस्त्र या मेसोपोटामिया से बड़ा है।

12. मगध साम्राज्य के उत्थान के क्या कारण थे?

Ans –  मगध साम्राज्य के उत्थान के अनेक कारण थे-

(i) भौगोलिक स्थिति : लौहयुग में मगध की भौगोलिक स्थिति बड़ी उपयुक्त थी, क्योंकि लोहे के समृद्ध भंडार मगध की आरंभिक राजधानी राजगीर से बहुत दूर नहीं थे। समृद्ध लौह खनिज के भंडार समीप उपलब्ध होने के कारण मगध के शासक अपने लिए प्रभावशाली हथियार तैयार करा सके। उनके विरोधी आसानी से ऐसी हथियार नहीं प्राप्त कर सकते थे अवंति में भी यही स्थिति थी, लेकिन मगध और में आगे थी। मगध की दोनों राजधानियाँ – प्रथम राजगीर और द्वितीय पाटलिपुत्र।

(ii) आर्थिक कारण मगध की आर्थिक सम्पन्नता ने भी मगध के उत्थान में सहायक बना। मगध राज्य मध्य गंगा मैदान में पड़ने के कारण अत्यंत ऊपजाऊ थे। भारी वर्षा होती थी, इसलिए सिंचाई के बिना भी इलाके को उत्पादक बनाया जा सकता था। लोहे का आविष्कार होने से कृषि क्षेत्र में और अधिक विकास हुआ।

(iii) सैनिक संगठन : सैनिक संगठन के मामले में मगध को एक खास सुविधा प्राप्त थी। मगध घोड़े और रथ के उपयोग से भली-भाँति परिचित थे। उसने पड़ोसियों के विरुद्ध हाथियों का प्रयोग किया।

(iv) मगध के शासकों का योगदान सौभाग्य से मगध को निरंतर योग्यतम राजा मिले यथा हर्यकवंश, शिशुनाग वंश, नंदवंश एवं मौर्य वंश के शासकों ने मगध के साम्राज्य का काफी विस्तार किया। बिम्बिसार से अशोक तक लगातार सीमाएँ फैलती रहीं।

अथवा, सूफीवाद पर संक्षिप्त लेख लिखें।

Ans – सल्तनत काल में इस्लाम धर्म में जो सबसे महत्त्वपूर्ण घटना घटी वह थी सूफीवाद या सूफी सम्प्रदाय का उदय। ‘सूफी’ शब्द की व्युत्पत्ति विवादास्पद है। आरंभ में अरब प्रदेश में ‘सूफी’ उन्हें कहा गया, जो सफ (ऊनी वस्त्र) पहनते थे। बाद में शुद्ध एवं पवित्र आचरण एवं विचारवाले (सफा) सूफी कहलाए। कुछ विद्वान यह भी मानते है कि मदीना में मुहम्मद साहब द्वारा बनवाई गई मस्जिद के बाहर सफा (मक्का की एक पहाड़ी) पर जिन लोगों ने शरण ली एवं अल्लाह की अराधना में मग्न रहे, उन्हें भी सूफी कहा जाता है। सूफीवाद का विकास ईरान में हुआ। वहाँ से यह भारत भी आया।

सूफीवाद दार्शनिक सिद्धांत पर आधृत था। सूफीवाद ने इस्लामी कट्टरपन को त्याग दिया और धार्मिक रहस्यवाद को स्वीकार किया। सूफी इस्लाम धर्म के कर्मकांडी एक कट्टरपंथी विचारों के विरोधी थे, फिर भी इस्लाम धर्म एवं कुरान की महत्ता को स्वीकार करते थे। सूफी संत एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे। उनका मानना था कि “ईश्वर एक है सभी कुछ ईश्वर में है, उनके बाहर कुछ नहीं है और सभी कुछ का त्याग कर प्रेम के द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। सूफी धार्मिक पवित्रता पर अत्यधिक बल देते थे। सूफियों के मध्य भी अनेक सम्प्रदाय थे, जिनमें बाह्य रूप से कुछ अंतर था, परंतु आंतरिक तौर पर भी सभी धार्मिक पवित्रता में विश्वास रखते थे।

13. अकबर की मनसबदारी व्यवस्था की विवेचना करें।

Ans – मनसबदारी मुगल प्रशासनिक व्यवस्था थी जिसे अकबर ने स्थापितं किया था। अकबर के शासनकाल तक मुगल क्षेत्र का विस्तार हो चुका था। साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए संगठित सेना की आवश्यकता पूर्ति के कारण मनसबदारी व्यवस्था स्थापित की थी। इसका मुख्य उद्देश्य था सेना को संगठित कर साम्राज्य का विस्तार तथा उसपर नियंत्रण रखना। इस व्यवस्था में अकबर ने अपने अधिकारियों को जाति के आधार पर एक मनसब प्रदान किया था। जाति के आधार पर मनसब को विभिन्न श्रेणियों में बाँटा था। श्रेणी के आधार पर प्रत्येक मनसब को सेना रखने का अधिकार दिया गया था। सेना के साथ पशु तथा गाड़ियाँ भी रखने का अधिकार दिया गया था। मनसबदारी का क्षेत्र उस अधिकारी की जागीर जैसा होता था। परंतु, प्रत्येक मनसबदार को सरकार की तरफ से श्रेणी के अनुरूप नकदी वेतन दिया जाता था। मनसबदारों को बादशाह उपहार, पुरस्कार देकर सम्मानित भी करता था।

मनसबदार की नियुक्ति मीर बख्शी पदाधिकारी तथा उमरा वर्ग के कुछ सदस्य करते थे। सेना को कोई भी व्यक्ति किसी उमरा के माध्यम से याचिका देता था। याचिका को बादशाह के सामने रखा जाता था। मीर बख्शी तथा अन्य याचिका पर विचार कर मनसबदारी प्रदान करते थे। मनसबदारों की दो श्रेणियाँ होती थीं- तैनात-ए-रकाब तथा तैनात-ए-सूबाजात। दोनों श्रेणियाँ केंद्रीय तथा प्रांतीय प्रशासनिक तथा सैनिक कार्यों में सहायता करती थीं। इनको समय-समय पर दरबार में उपस्थित होकर दरबारी शिष्टाचार निभाना होता था। कभी-कभी ये व्यापार का काम भी देखते थे। अकबर से औरंगजेब तक मनसबदारी व्यवस्था मुगल प्रशासन का आधार थी। केंद्रीय शासन के कमजोर होने पर अनेक मनसबदार स्वतंत्र हो गए तथा मुगल साम्राज्य के पतन के कारण बने।

अथवा, मुगल काल में जमींदारों की स्थिति का वर्णन करें।

Ans – मध्यकाल में कृषि संरचना में जमींदारों को जो स्थान प्राप्त था, वह ग्रामीण समाज में उसकी श्रेष्ठता स्थापित करता है। मुगलकाल में जमींदार शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम इलाके के प्रधान के लिए किया जाता था। अकबर के समय में यह पद किसी भी व्यक्ति के उत्पादन से सीधा हिस्सा ग्रहण करने के आनुवंशिक दावों के लिए जाना जाता था। अलग-अलग क्षेत्रों में जमींदार के पर्याय के रूप में अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया जाता रहा तथा जिन क्षेत्रों में जमींदार नहीं थे उनको रैयती अर्थात् किसानों का अधिकार क्षेत्र कहा गया।

वास्तव में जमींदार भूमि के उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़े हुए थे और भू-राजस्व पर उनका दावा आनुवंशिक था। मुगल काल में जमींदार वर्ग का जन्म नहीं हुआ बल्कि यह पहले से ही कायम था। हालांकि सम्राट को किसी गाँव में जमींदार रखने या हटाने का पूर्ण अधिकार था किन्तु ऐसा वे विशेष परिस्थिति में ही कर सकते थे। मध्यकालीन शासकों ने जमींदारों के अधिकारों की वैधता प्रदान की किन्तु वे सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राजस्व वसूली का काम करते थे। इसके बदले में उन्हें राजस्व का कुछ हिस्सा मिलता था। अधिकांश जमींदार अपनी निजी सेना रखते थे जिनकी सहायता से वे राजस्व की वसूली करते थे।

14. आधुनिक भारत के निर्माण में डॉ० बी० आर० अम्बेडकर की देनों का मूल्यांकन कीजिए।

Ans -डॉ० भीमराव अम्बेडकर उस तेजपुंज का नाम है जो प्रकाश ही प्रकाश देता है, लेकिन जलाता नहीं। बचपन से ही ये मेधावी और गहन चिंतक छात्र थे। चौदह वर्ष की उम्र में ही इनका विवाह रामबाई से हो गया। 1913 ई० में अम्बेडकर बड़ौदा नरेश की सहायता से अमेरिका चले गये। 1915 में इन्होंने वहाँ एम० ए० की डिग्री प्राप्त की और 1916 ई० में इन्हें पी-एच०डी० की डिग्री से सम्मानित किया गया। अपने देश लौटने पर इन्होंने 1920 ई० में कोल्हापुर के महाराजा की सहायता से ‘मूक नन्ह नामक पत्रिका का सम्पादन प्रारंभ किया जिसमें सामाजिक विकृतियों पर करारा प्रहार किया। सन् 1923 से 1931 तक का समय अम्बेडकर के लिए कठोर संघर्ष और अभ्युदय का था। इसी बीच वे दलितों के नेता एवं प्रवक्ता के रूप में उभरकर सामने आए। इन्होंने जाकर गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया और अंग्रेज शासक से दलितों की गई माँग भारतीय दलितों को इन्होंने कहा- शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो। 1935 ई० में इनकी धर्मपत्नी का देहान्त हो गया। इसी साल इन्होंने धर्म-परिवर्तन की घोषणा की। इन्होंने बहिष्कृत हितकारी सभा, सिद्धांत महाविद्यालय एवं स्वतंत्र मजदूर की स्थापना की। 1946 ई० तक अम्बेडकर की ख्याति देश के एक कोने से दूसरे कोने तक की गयी थी। 1947 ई० में नेहरूजी के मंत्रिमंडल में इन्हें कानूनी मंत्री बनाया गया। 21 अगस्त, 1950 ई० को इन्होंने भारत का संविधान राष्ट्र को समर्पित कर दिया। इसी साल वे कोलम्बो गए और दिल्ली में अम्बेडकर भवन का शिलान्यास किया। 1956 ई० में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और 6 दिसम्बर, 1956 ई० को ही इस महामानव को महापरिनिर्वाण हुआ।

वे अछूतों और दलितों के मसीहा, उद्धारकर्ता और पथ-प्रदर्शक थे। 1990-91 ई० में इनकी जन्म-शताब्दी धूम-धाम से मनाई गई और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। दलितों को समान अधिकार देना और उनका यथोचित उत्थान करना ही बाबा साहब की सच्ची श्रद्धांजलि होगी। भारत के दलितों एवं पीड़ितों को उन्होंने जो जीवन-संदेश दिया था- ‘उठकर आगे बढ़ो’ आज उससे सबों के हृदयतंत्री झंकृत हो रहे हैं और उनमें से मधुर संगीत का स्वर फूट रहा है।

अथवा, गोलमेज सम्मेलन क्यों आयोजित किये गये? इनके कार्यों की विवेचना करें।

Ans – नमक यात्रा के कारण अंग्रेजों को यह अहसास हुआ की उनका शासन अधिक दिन नहीं चलेगा। इसलिए अब भारतियों को सत्ता में हिस्सा देना जरूरी था। इस पर विचार के लिए तीन गोलमेज सम्मलेन हुए और इनका कोई महत्त्वपूर्ण परिणाम नहीं निकला।

गाँधी-इरविन समझौता प्रथम गोलमेज सम्मेलन असफल रहा। 19 जनवरी, 1931 ई० को बिना किसी निर्णय के यह समाप्त कर दिया गया। यह स्पष्ट हो गया कि काँग्रेस के बिना कोई संवैधानिक निर्णय नहीं लिया जा सकता है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मेकडोनाल्ड तथा इरविन दोनों को ज्ञात हो गया कि कांग्रेस के बिना किसी संविधान का निर्माण नहीं किया जा सकता है। देश में उचित वातावरण बनाने के लिए इरविन ने कांग्रेस से प्रतिबन्ध हटा दिया तथा गाँधीजी तथा अन्य नेताओं को छोड़ दिया। अंततः 5 मार्च, 1931 को गाँधी तथा इरविन में समझौता हो गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस हो गया व द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में काँग्रेस ने भाग लेना स्वीकार कर लिया।

दूसरा गोलमेज सम्मेलन गाँधी-इरविन समझौता के तहत दूसरे गोलमेज सम्मेलन में काँग्रेस की ओर से एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में महात्मा गाँधी ने भाग लिया। मुस्लिम लीग से मुहम्मद अली जिन्ना ने भाग लिया। 7 सितम्बर, 1931 ई० को दूसरा गोलमेज सम्मेलन प्रारंभ हुआ। गाँधीजी 12 सितम्बर को लन्दन पहुँचे। विभिन्न दल व वर्ग अपना-अपना हित देख रहे थे।

तीसरा गोलमेज सम्मेलन भारत मंत्री ने तीसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया। यह सम्मेलन 17 नवम्बर, 1932 ई० से 24 दिसम्बर, 1932 ई० तक चला। कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया क्योंकि उसके सभी नेता जेल में बंद थे।

15. भारत छोड़ो आंदोलन के कारणों का उल्लेख करें।

Ans – भारत छोड़ो आंदोलन के कारण

(1) क्रिप्स मिशन से निराशा- भारतीयों – के मन में यह बात बैठ गई थी कि क्रिप्स मिशन अंग्रेजों की एक चाल थी जो भारतीयों को धोखे में रखने के लिए चली गई थी। क्रिप्स मिशन की असफलता के कारण उसे वापस बुला लिया गया था।

(2) बर्मा में भारतीयों पर अत्याचार- बर्मा में भारतीयों के साथ किये गए दुर्व्यवहार से भारतीयों के मन में आंदोलन प्रारम्भ करने की तीव्र भावना जागृत हुई ।

(3) ब्रिटिश सरकार की घोषणा – 27 जुलाई, 1942 ई० को ब्रिटिश सरकार ने एक घोषणा जारी कर यह कहा कि कांग्रेस की माँग स्वीकार की गई तो उससे भारत में रहने वाले मुस्लिम तथा अछूत जनता के ऊपर हिन्दुओं का आधिपत्य हो जाएगा। इस नीति के कारण भी भारत छोड़ो आंदोलन आवश्यक हो गया।

(4) द्वितीय विश्वयुद्ध के लक्ष्य के घोषणा- ब्रिटिश सरकार भारतीयों को भी द्वितीय विश्व युद्ध की लड़ाई में सम्मिलित कर चुकी थी, परन्तु अपना स्पष्ट लक्ष्य घोषित नहीं कर रही थी। यदि स्वतंत्रता एवं समानता के लिए युद्ध हो रहा है तो भारत को भी स्वतंत्रता एवं आत्मनिर्णय का अधिकार क्यों नहीं दिया जाता?

भारत छोडो आंदोलन के परिणाम

(1) ब्रिटिश सरकार ने हजारों भारतीय आंदोलनकारियों को बन्दी बना लिया तथा बहुतों को दमन का शिकार होकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। (2) अंतर्राष्ट्रीय जनमत को इंग्लैण्ड के विरूद्ध जागृत किया। चीन और अमेरिका चाहते थे कि अंग्रेज भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्र कर दें। (3) इस भारत छोड़ो आंदोलन ने जनता में अंग्रेजों के विरूद्ध अपार उत्साह तथा जागृति उत्पन्न की। (4) इस भारत छोड़ो आंदोलन में जमींदार, युवा, मजदूर, किसान और महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। यहाँ तक कि पुलिस व प्रशासन के निचले वर्ग के कर्मचारियों ने आंदोलन-कारियों को अप्रत्यक्ष सहायता दी एवं आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति दिखाई।

अथवा, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गाँधी के योगदान का वर्णन करें।

Ans – गाँधीजी के भारतीय राजनीति में प्रवेश के पूर्व राष्ट्रीय आंदोलन भारत के मुट्ठीभर शिक्षित वर्ग तक सीमित था। काँग्रेस के आरंभिक काल में उदार सदस्यों का प्रभाव था। ये भारत के विभिन्न क्षेत्र के शिक्षित लोग थे और इन्हें अँगरेजी शासन पर पूर्ण विश्वास था। य राजनीतिक अधिकार के बजाय सामाजिक सुधार चाहते थे और मानते थे कि ये सुधार अँगरेजी सरकार ही कर सकती है। गाँधीजी ने इस धारणा को बदला था। वे भी सामाजिक सुधार चाहते थे। उन्होंने लोगों को छुआछूत मिटाने तथा स्त्रियों के उद्धार के लिए प्रयास किया था। उन्होंने इसके लिए कई कार्यक्रम आरंभ किए थे। उन्होंने काँग्रेस के गरम दल के सिद्धांत, स्वदेशी नीति तथा बहिष्कार की नीति को अपनाया। वे पाश्चात्य औद्योगिकीकरण के बजाय ग्रामीण क्षेत्र को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना चाहते थे। इस कारण उन्होंने चरखा चलाना आरंभ किया था। उन्होंने बहिष्कार की नीति अपनाकर स्वदेशी नीति को अपनाया था। स्वदेशी नीति से उन्होंने जनसाधरण के व्यवसायों को प्रोत्साहन दिया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया। 1

राजनीति में उन्होंने अहिंसा तथा सत्याग्रह की नीतियों को अपनाया था। इसके द्वारा उन्होंने चंपारण, खेड़ा तथा अहमदाबाद के किसानों और मजदूरों को सफलता दिलाई थी। इस सफलता से किसान तथा मजदूरों की हिम्मत बढ़ गई थी। गाँधीजी मानते थे कि जब तक किसानों तथा मजदूरों को उनके श्रम का लाभ नहीं मिलता तब तक राजनीतिक अधिकार का कोई लाभ नहीं है। बनारस में उन्होंने स्पष्ट किया था कि आम जनता से ही स्वतंत्रता मिल सकती है। उन्होंने गरीब जनता में राष्ट्रवादी भावना को न केवल जगाया था, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय आंदोलनों में भागीदार भी बनाया था। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन किया और समाज के सभी वर्ग (स्त्रियाँ भी) को उसमें भाग लेने के लिए प्रभावित किया था। इस प्रकार गाँधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन को शिक्षित वर्ग से आम लोगों तक पहुँचाया और उन्हें स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

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