Bihar Board 12th Class History Model Set 1 Subjective – Answer
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| Subject | History |
|---|---|
| Class | 12th |
| Model Set | 1 |
| Session | 2024-26 |
| Subjective Question | All Most VVI Questions |
History – इतिहास | Class 12 ( Arts ) | By-Suraj Sir
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न संख्या 1 से 30 तक लघु उत्तरीय प्रश्न है। इनमें से किन्ही 15 प्रश्नों का उत्तर दें। प्रत्येक के लिए दो अंक निर्धारित है।
1. अभिलेख किसे कहते हैं? अभिलेखों के दो महत्व बताइए।
Ans – अभिलेख पत्थर, धातु आदि की सतहों पर उत्कीर्ण किये गये पाठन सामग्री को कहते हैं। इसका प्रयोग प्राचीन काल से ही हो रहा है। यह मुख्य रूप से शासकों का राज्यादेश होता था। सबसे प्राचीन अभिलेख अशोक के प्रस्तर अभिलेख है। सोना, चाँदी, पीतल, ताँबा, लोहा आदि पर लिखित अभिलेख पाये गये हैं। अभिलेख किसी भी कालखंड के जानकारी प्राप्त करने का प्राथमिक स्त्रोत माना जाता है।
2.. 1857 के विद्रोह के मुख्य कारण क्या थे ?
Ans – 1857 की क्रांति भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। इसमें पहली बार अंग्रेजों का मुकाबला भारतीय राजाओं से हुआ। इस क्रांति के निम्न कारण थे
(1) विदेशी शासन के प्रति घृणा – 1857 की क्रांति का मुख्य कारण था लोगों में विदेशी शासन के प्रति घृणा होने लगी थी।
(ii) डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति- डलहौजी की हड़प नीति, कुप्रशासन का आरोप, दत्तक पुत्र के नियम में बदलाव के कारण सतारा, नागपुर, झाँसी, अवध, आदि का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर लिया गया। इससे यहाँ के स्थानीय शासक और जनता अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की शुरुआत की।
3. 1857 के क्रांति का तात्कालिक कारण क्या था ?
Ans – 1857 की क्रांति के तात्कालिक कारण के रूप में नये चर्बी वाले कारतूस के प्रयोग से यह क्रांति शुरू हुई। चर्बी वाले कारतूस को बनाने में गाय और सुअर की चर्बी का प्रयोग होता था। इससे सेना के हिन्दू और मुस्लिम विरोध करने लगे तथा 10 मई, 1857 को मेरठ से इस क्रांति की शुरुआत हुई।
4. उत्खनन से आप क्या समझते हैं ?
Ans –उत्खनन उस प्रक्रिया को कहा जाता है जिसमें किसी पुराने टीले की खुदाई कर पुरानी सभ्यता की जानकारी हासिल की जाती है। यह क्षैतिज और उर्ध्वाधर दो प्रकार से किया जाता है। इसमें प्राचीन कालीन पुरावशेष जैसे अभिलेख, मृण मूर्तियाँ, सिक्के, भवन अवशेष आदि पाये जाते हैं।
5. सिन्धुघाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता क्यों कहा जाता है ?
Ans –सिन्धुघाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता इसलिए कहा जाता है क्योंकि हड़प्पा नामक स्थान पर ही सर्वप्रथम 1922 ई० में राखल दास बनर्जी ने उत्खनन करवाया और नगर सभ्यता को प्रकाश में लाया। इसके बाद ही अन्य स्थानों पर पुरातात्विक खुदाई की गई। सिन्धुघाटी सभ्यता का सबसे महत्त्वपूर्ण नगर होने तथा हड़प्पा में ही इस सभ्यता का उत्खनन होने के चलते ही इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है।
6. महात्मा बुद्ध की शिक्षायें क्या थीं ?
Ans – महात्मा बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। इनकी मुख्य शिक्षायें निम्न थींः
(i) चार आर्य सत्य है-दुःख, दुरः समुदाय, दुखनिरोध, दुख निषेध गामिनी क्रिया
(ii) अष्टांगिक मार्ग- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि ।
(iii) मनुष्य को मध्यम मार्गी होना चाहिए।
(iv) मनुष्य को अहिंसा का पालन करना चाहिए।
( v) जातिवाद, यज्ञ परंपरा आदि में अविश्वास रखना चाहिए।
7. स्वदेशी आन्दोलन पर टिप्पणी लिखें।
Ans – बंगाल विभाजन के परिणामस्वरूप बहिष्कार और स्वदेशी आन्दोलन का उदय और विकास हुआ। यह सिर्फ बंगाल तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव भारत के अन्य भागों में भी पड़ा। बंगाल में इस आन्दोलन की प्रेरणा रविन्द्रनाथ ठाकुर, विपिनचन्द्र पाल, अरविन्द घोष और अन्य नेताओं से मिली। इन लोगों ने आत्मशक्ति के विकास, स्वदेशी उद्योग की स्थापना, सामाजिक सुधार कार्यक्रम और राष्ट्रीय शिक्षा और साहित्य के विकास पर बल दिया। स्वदेशी आन्दोलन के दौरान छुआछूत, दहेज, बाल-विवाह, नशाखोरी जैसी कुप्रथाओं के मिटाने के भी प्रयास किये गये।
8. अगस्त प्रस्ताव से आप क्या समझते हैं ?
Ans – ब्रिटिश सरकार के द्वारा भारतीयों को उनकी मर्जी के बिना युद्ध में शामिल कर दिया गया था। 1940 में जब सरकार की हालत बिगड़ने लगी तो उन्होंने भारतीयों से सहायता की अपील की। 8 अगस्त, 1940 को तत्कालीन वायसराय लिनलिथगो ने अगस्त प्रस्ताव की घोषणा की जिसके अनुसार कार्यकारिणी में भारतीयों की संख्या बढ़ाने की बात कही गयी थी। इसके अतिरिक्त ‘युद्ध परामर्श समिति’ का गठन करने तथा अल्पसंख्यकों को भरोसे में लेने की बात कही गयी थी। युद्ध के बाद भारतीयों के साथ संवैधानिक विचार-विमर्श की बात कही गयी।
9. जोतदार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans – जोतदार 18वीं सदी के अंत में उभरा हुआ वर्ग था। वस्तुतः धनी कृषकों को जोतदार कहा जाता था जिसका विवरण फ्रांसिस बुकानन के सर्वे में हम पाते हैं। जोतदारों के पास जमीनों के बड़े-बड़े रकबे होते थे जो कई हजार एकड़ में फैले होते थे और उनकी जमीनों पर उपज बंटाईदार के माध्यम से की जाती थी। ये बंटाईदार खेती करके उपज का आधा भाग जोतदार को दे देते थे। जोतदार गाँव में ही निवास करते थे तथा जमींदारों से अधिक प्रभावशाली होते थे क्योंकि गाँव के व्यक्तियों पर इनका सीधा नियंत्रण स्थापित था।
10. महाजनपद से आप क्या समझते हैं?
Ans – उत्तर-वैदिक काल में जिस क्षेत्रीय राज्यों के उदय की प्रक्रिया आरम्भ हुई थी वह छठी सदी ई० पू० तक आते-आते बड़े राज्यों में बदल गई। इन्हीं प्रभुता संम्पन्न राज्य को महाजनपद कहा गया है।
- बौद्ध ग्रन्थ अंगुतर निकाय के अनुसार 16 महाजनपद थे जो निम्नलिखित हैं (i) काशी (ii) कोशल (iii) अंग (iv) मगध (v) वज्जि (vi) मल्ल (vii) चेदि (viii) वत्स (ix) कुरू (x) पांचाल (xi) मत्स्य (xii) शूरसेन (xiii) अश्मक (xiv) अवन्ति (xv) गांधार (xvi) कम्बोज।
11. ‘धन निष्कासन’ से आप क्या समझते हैं?
Ans – ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप भारत से बड़ी मात्रा में धन का निष्कासन हुआ। यह धन इंगलैंड विभिन्न रूपों में ले जाया गया। बंगाल में कंपनी शासन की स्थापना के पूर्व इंगलैण्ड का पर्याप्त धन व्यापार के माध्यम से भारत आता था, परन्तु 1757 ई० के पश्चात् भारत से ही धन इंगलैंड जाने लगा। भारत से ले जाये गये धन के बदले भारत को कुछ नहीं मिला। यही ‘धन का निष्कासन’ था। भारतीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब यहाँ के विदेशी शासक नियमित रूप से धन अपने देश ले गये।
12. 1857 की क्रांति की असफलता के चार कारण लिखें।
Ans – 1857 की क्रांति की असफलता के चार कारण निम्नलिखित थे-
(i) विद्रोहियों में एकता का अभाव;
(ii) जनता में राष्ट्रीयता की भावना का अभाव
(iii) अनेक भारतीय नरेशों और सरदारों की अंग्रेजों के प्रति भक्ति ।
(iv) विद्रोहियों को साधनों की अपेक्षाकृत कमी।
13. 1907 में काँग्रेस में विभाजन क्यों हुआ ?
Ans – काँग्रेस के अंदर उदारवादियों की नीतियों के विरुद्ध 1895 से असंतोष बढ़ने लगा था। अरविंद घोष, तिलक, लाजपत राय जैसे नेता काँग्रेस नेतृत्व से अधिक प्रभावशाली नीतियों की माँग कर रहे थे। बनारस अधिवेशन (1905) के बाद गोखले काँग्रेस से अलग हो गये। फलतः 1906 में तिलक के स्थान पर दादाभाई नौरोजी को काँग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। उग्रवादियों के दबाव के कारण कलकता अधिवेशन (1906) में काँग्रेस नेतृत्व ने स्वराज्य, स्वदेशी, वॉयकॉट और राष्ट्रीय शिक्षा पर प्रस्ताव तो स्वीकार कर लिया, परंतु उसे लागु करने का कोई प्रयास नहीं किया। 1907 के सुरत अधिवेशन के लिए लाला लाजपत राय के स्थान पर रास बिहारी घोष को काँग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। तिलक को बोलने नहीं दिया गया। इस घटना के बाद तिलक और उनके सहयोगी काँग्रेस से अलग हो गये। काँग्रेस पर उदारवादियों का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।
14. किन आधारों पर संविधान की आलोचना की जाती है ?
Ans – देशी-विदेशी विद्वानों ने निम्न आधारों पर भारतीय संविधान की आलोचना की है-
(i) यह सभा जनता द्वारा निर्वाचित नहीं थी। भारत के संविधान सभा जैसी महत्त्वपूर्ण संस्था के गठन के लिए जनता को प्रत्यक्ष रूप से भागीदार बनाना अति आवश्यक था, क्योंकि उसके द्वारा बनाये जाने वाले संविधान का मूल उद्देश्य भारतीय जनता की आकांक्षाओं को पूर्ण करना था।
(ii) संविधान सभा को एक दलीय संस्था कहकर भी आलोचना की जाती है। उस समय भारत में कांग्रेस का प्रभुत्व था इसलिए संविधान सभा पर कांग्रेस का प्रभाव था। अतः इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि यह प्रभुत्व संपन्न संस्था थी।
15. दांडी मार्च का उद्देश्य क्या था ?
Ans – महात्मा गाँधी द्वारा 12 मार्च, 1930 में अहमदाबाद के पास साबरमती आश्रम से दांडी मार्च की शुरुआत की गई थी। इस मार्च का मुख्य उद्देश्य था नमक जैसी नैसर्गिक वस्तु पर कर लगाने के कानून का विरोध करना। समुद्र किनारे दांडी में समुद्र जल से नमक तैयार कर गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की थी।
16. क्रिप्स मिशन भारत कब आया? इस मिशन के अध्यक्ष कौन थे?
Ans –क्रिप्स मिशन भारत द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1942 ई० में भारत आया था। इस मिशन के अध्यक्ष सर स्टैफोर्ड क्रिप्स थे। इसने युद्ध के बाद भारत में संवैधानिक सुधार का प्रस्ताव दिया जिसे भारतीय नेताओं ने अस्वीकार कर दिया था।
17. वर्धा योजना क्या थी ?
Ans – महात्मा गाँधी ने 1937 ई० में देश के समक्ष शिक्षा योजना प्रस्तुत की। उन्होंने शिक्षा को स्वावलंबी बनाने पर बल दिया। वह चाहते थे कि शिक्षा के साथ-साथ छात्र को कोई ऐसे व्यवसाय का प्रशिक्षण भी दिया जाये जिससे वह बाद में जीवनयापन कर सके। इन स्कूलों में बनी हुई वस्तुओं के विक्रय की व्यवस्था सरकार करे। 7 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध हो और वह मातृभाषा में दी जाये। सरकार द्वारा इस योजना पर कोई ध्यान नहीं दिया गया
18. गाँधी-इरविन समझौता का परिचय दें।
Ans – 1930 में गाँधी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ करने, क्रांतिकारी आंदोलन में वृद्धि, प्रथम गोलमेज सम्मेलन की विफलता ने सरकार को गाँधीजी से वार्ता करने को बाध्य कर दिया। वायसराय इरविन ने उनसे समझौता के लिए वार्ता आरंभ कर दी। 5 मार्च, 1931 को गांधी इरविन पैक्ट हुआ। इसके अनुसार सरकार ने राजनीतिक बंदियों को मुक्त करने; असहयोग आंदोलन के दौरान जब्त की गयी संपत्ति लौटाने, दमनात्मक कार्रवाई बंद करने तथा मुकदमें वापस लेने की शर्त मान ली। भारतीयों को नमक बनाने का अधिकार मिला।
19. शिमला सम्मेलन के असफलता के क्या कारण थे ?
Ans – शिमला सम्मेलन 25 जून, 1945 ई० को हुआ था। यह शिमला में होने वाला एक सर्वदलीय सम्मेलन था, जिसमें कुल 22 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। इस सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रमुख नेता थे जवाहरलाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना, सरदार पटेल, अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खाँ आदि। ब्रिटिश भारत की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में से एक ‘मुस्लिम लीग’ की जिद के कारण यह सम्मेलन असफल हो गया। सम्मेलन के दौरान ‘मुस्लिम लीग’ द्वारा यह शर्त रखी गई कि वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त होने वाले सभी मुस्लिम सदस्यों का चयन वह स्वयं करेगी। मुस्लिम सदस्यों का चयन वह स्वयं करेगी। मुस्लिम लीग का यही अड़ियल रवैया 25 जून से 14 जुलाई तक चलने वाले ‘शिमला सम्मेलन’ की असफलता का प्रमुख कारण बना।
20. संथालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया ?
Ans – संथाल विद्रोह अंग्रेज अधिकारियों, जमींदारों, व्यापारियों तथा महाजनों के शोषण और अत्याचार का परिणाम था। व्यापारियों, महाजनों और साहूकार जिन्हें संथाल आदिवासी दिकू कहकर संबोधित करते थे, ये लोग संथालों के जंगलों पर परम्परागत अधिकार से वंचित कर दिये गए और उनके जमीन जायदाद छिन लिये। इस कार्य में महाजनों और साहूकारों को अंग्रेज अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त था।
इस प्रकार शोषण तथा अत्याचार से पीड़ित संथालों ने सिद्धू तथा कान्हु के नेतृत्व में 1855-56 में विद्रोह कर दिया।
21. अकबर ने यात्रा कर क्यों समाप्त किया? दो कारण लिखें।
Ans – अकबर ने 1563 ई० हिन्दुओं पर तीर्थ यात्रा कर को समाप्त कर दिया।
इसके दो कारण निम्न हैं :
(i ) राजनीतिक आवश्यकता- अकबर यह मानता था कि हिन्दुस्तान में हिन्दू बहुसंख्यक है। उन्हें सत्ता के प्रति वफादार बनाने के लिए उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
(ii) वैवाहिक संबंध- अकबर के हरम में कई रानियाँ हिन्दू परिवार की थीं। उन रानियों के प्रभाव के कारण भी अकबर धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाते हुए यात्रा कर समाप्त किया।
22. अकबर के नवरत्नों के नाम बतलाइये।
Ans – अकबर के दरबार में विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञ थे जिन्हें अकबर के दरबार का नौ रत्न कहा जाता था। इन नौ रत्नों के नाम इस प्रकार हैं-
(i) अब्दुल रहीम खान-ए-खाना, (ii) हकीमहुकाम, (iii) मुल्ला दो प्याजा, (iv) अबुल फजल, (v) फैजी, (vi) तानसेन, (vii) राजा मानसिंह, (viii) टोडरमल, (ix) बीरबल।
23. शाहजहाँ के काल में संगीत कला का वर्णन कीजिए।
Ans – शाहजहाँ संगीत कला से बेहद प्यार करता था। वह दरबार में संगीतज्ञों को आश्रय देता था। वह स्वयं भी अच्छा गायक था। उसके कालों में ही संगीत कला ने अच्छा स्थान प्राप्त कर लिया था। उसके दरबार में प्रसिद्ध कवि तथा संगीतकार रहते थे। इसमें प्रमुख नाम रामदास, दीरंग खाँ, जगन्नाथ, लाल खाँ भावमदू, महापात्र आदि हैं।
24. मुगलकालीन हरम के बारे में आप क्या जानते हैं ?
Ans – मुगलकाल में हरम मुगलों के घरेलू संसार का प्रतीक था। इसमें बादशाह की पत्नियाँ, उपपत्नियाँ, उनके नजदीकी व दूर के रिश्तेदार दासी इत्यादि सभी रहते थे।
जो स्त्रियाँ मुगल परिवार में शाही खानदान से आती थीं, उन्हें बेगम कहा जाता था। जिन स्त्रियों का जन्म कुलीन परिवार में नहीं हुआ था, वे अगहा कहलाती थीं। बेगम का स्थान सबसे ऊँचा था। पदानुक्रम के अनुसार सभी को नगद मासिक भत्ता व उपहार मिलते थे। बादशाह नियमित रूप से हरम में आराम के लिये जाता था।
25. रेहला पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans – मोरक्को निवासी इब्नबतुता ने अपनी भारत यात्रा के बाद स्वदेश लौटने पर यात्रा वृतांत लिखा। इब्नबतुता ने रेहला में तुगलक को कठोर एवं निर्दयी शासक बताया है। उसने छोटे-छोटे अपराधों के लिए अपराधियों का अंग काट लेने की बात कही है। किसी गलतफहमी का शिकार होकर इब्नबतुता को भी कारागार में डाल दिया गया था। बाद में गलतफहमी दूर होने पर उसे राजकीय सेवा में लेकर दिल्ली का काजी नियुक्त किया था।
26. कबीर के क्या सिद्धांत थे ?
Ans – कबीर का नाम भी भक्ति आंदोलन को गति प्रदान करने वाले सन्तों में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि वे अधिक पढ़े लिखे नहीं थे किन्तु फिर भी उनमें विद्वता तथा ज्ञान की बहुतायत थी। कबीर सांप्रदायिक एकता के पक्षपाती थे तथा आडम्बरों के विरोधी थे। संक्षेप में कबीर के सिद्धांत निम्नलिखित थे-
(i) ईश्वर की एकता पर बल।
(ii) निराकार निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल।
27. वर्ण और जाति में कोई दो अंतर बताइए।
Ans – वर्ण और जाति में अंतर-
(i) वर्ण कर्म आधारित थे जबकि जाति जन्म आधारित थी।
(ii) वर्ण की संख्या मात्र चार थी जबकि जाति की असंख्य थी।
28. छठी शताब्दी ई०पू० के किन्हीं चार महाजनपदों के नाम लिखें।
Ans – छठी शताब्दी ई० पू० के चार महाजनपदों के नाम निम्नलिखित है-अंग, मगध, काशी, वत्स ।
29. मीराबाई का संक्षिप्त परिचय दें।
Ans – मीराबाई का जन्म 1498 ई० में पाली के कुड़की गाँव में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर हुआ था। ये बचपन से ही कृष्ण भक्त थी। इनका विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ था। उदयपुर के राजा भोजराज इनके पति थे। पति की मृत्यु के बाद इन्होंने कृष्ण को अपना पतिस्वरूप मानकर संत बन गई। इन्होंने रैदास से दीक्षा ली थी। भक्ति संतों में सगुण भक्ति की महान संत थी।
30. ‘प्रारूप समिति’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans – संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा द्वारा प्रारूप समिति का गठन किया गया। इस समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ० भीमराव अम्बेदकर की नियुक्ति की गई। प्रारूप समिति का काम था कि वह संविधान सभा की परामर्श शाखा द्वारा तैयार किये गये संविधान का परिक्षण करे और संविधान के प्रारूप को विचारार्थ संविधान सभा के सम्मुख प्रस्तुत करे।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
निर्देश प्रश्न संख्या 31 से 38 तक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न हैं। इस कोटि के प्रत्येक प्रश्न के लिए 5 अंक निर्धारित हैं। किन्हीं 4 प्रश्नों के उत्तर दें। अधिकतम 100 से 120 शब्दों में उत्तर दें। 4 x 5 =20
31. मौर्य साम्राज्य के नगर प्रशासन पर प्रकाश डालें।
Ans – मेगास्थनीज ने मौर्यकालीन नगर प्रशासन का सबसे विस्तृत एवं विशद वर्णन किया है। उनके अनुसार नगर का शासन प्रबन्ध 30 सदस्यों की एक समिति के हाथ में था। यह समिति छः समितियों में विभक्त थी। प्रत्येक समिति में पाँच सदस्य होते थे, ये समितियाँ इस प्रकार थीं-
(i) शिल्पकला समिति- इस समिति के लोग उद्योग-धन्धों का निरीक्षण एवं प्रबंध करते थे।
(ii) जनगणना समिति- यह समिति जन्म-मरण का लेखा रखती थी।
(iii) वाणिज्य समिति- यह समिति नाप-तौल का निरीक्षण, क्रय-विक्रय का निरीक्षण तथा प्रबंध करते थे।
(iv) उद्योग समिति- यह समिति उत्पादित वस्तुओं की देखभाल करती थी।
(v) कर समिति-इस समिति का प्रमुख कार्य कर वसूल करना था।
32. असहयोग आंदोलन की प्रकृति एवं परिणामों का वर्णन करें।
Ans – भारतीय राजनीति में प्रवेश करने के पश्चात गाँधीजी ने देशव्यापी आंदोलन ‘असहयोग आंदोलन’ चलाया। इस आंदोलन ने गाँधीजी को राष्ट्रीय आंदोलन का सर्वमान्य नेता बना दिया।
असहयोग आंदोलन के कारण- प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात उत्पन्न आर्थिक असंतोष, अकाल, महामारी से किसानों; मजदूरों एवं अन्य वर्गों में असंतोष फैल रहा था। 1919 के सुधार अधिनियम में शिक्षित भारतीय भी संतुष्ट नहीं हो सके। क्रांतिकारी आंदोलन का विकास हो रहा था। सरकार ने इसका बहाना बनाकर दमनात्मक कार्रवाइयाँ आरंभ कर दी। इसी का एक परिणाम रॉलेट एक्ट कानून का पारित होना था। इस ‘काला कानून’ की भारतीयों में व्यापक प्रतिक्रिया हुई। इसके विरोध में होने वाले प्रदर्शनों को दबाने के क्रम में जालियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ जिसने गाँधीजी जैसे अहिंसक व्यक्ति को हिलाकर रख दिया। अंग्रेजी न्यायप्रियता में उनका विश्वास समाप्त हो गया। उन्होंने 1 अगस्त, 1920 को असहयोग आंदोलन आरंभ करने की घोषणा कर दी।
असहयोग आंदोलन का महत्त्व – 5 फरवरी, 1922 को गोरखपुर जिला में चौरी-चौरा स्थान में कुद्ध भीड़ ने पुलिस द्वारा गोली चलाये जाने के विरोध में थाना में आग लगा दिया। इनमें अनेक पुलिसकर्मी जिंदा जल गये। गाँधीजी को इस घटना से दुःख हुआ और आंदोलन वापस ले लिया। गाँधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने की घटना से पूरा देश स्तब्ध रह गया। गाँधीजी की कटु आलोचना की गई, परंतु गाँधीजी आंदोलन में बढ़ती हिंसा से दुःखी होकर इसे वापस लेने का निर्णय लिया। असहयोग आंदोलन की बहिष्कार की नीति पूर्णरूपेण सफल नहीं हो सकी, न तो विधानसभाओं का बहिष्कार किया जा सका और न ही 1920 के निर्वाचन को बंद करवाया जा सका। अपने रचनात्मक कार्यों में इसे अधिक सफलता मिली। इस आंदोलन में कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की। कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन को इसने जनप्रिय बना दिया। साथ ही, इसने कांग्रेस में विभेद भी उत्पन्न कर दिया जिससे स्वराज्यवादियों का उदय हुआ।
33. हड़प्पा सभ्यता की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति की विवेचना करें।
Ans – सामाजिक जीवन- सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि सिन्धु सभ्यता के लोगों का सामाजिक जीवन काफी उन्नत था। उनकी सभ्यता नागरिक सभ्यता थी और इन्हें आधुनिक जीवन की सुख-सुविधायें प्राप्त थी। इसके साथ ही लोग शिक्षित थे और लेखन कला का ज्ञान प्राप्त था। सिन्धु सभ्यता से प्राप्त अवशेषों से मालूम पड़ता है कि समाज चार भागों में बँटा हुआ था- (i) विद्वान (ii) योद्धा (iii) व्यवसायी और (iv) श्रमिक।
सिन्धु सभ्यता के लोगों का भोजन सादा व पौष्टिक था जिनमें गेहूँ और जौ की प्रधानता थी। फल और विभिन्न तरह के सब्जियाँ भी इनके भोजन में शामिल था। ये लोग दूध और दूध से बनी सामग्रियों का भी प्रयोग करते थे। इनके भोजन में भेड़, मछली, कछुए व अण्डे भी शामिल थे। पहनावा ओढ़ावा में सूती एवं ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे। स्त्री और पुरुषों में आभूषणों का बड़ा शौक था।
आर्थिक जीवन सिन्धु सभ्यता के लोगों के आर्थिक जीवन में कृषि, पशुपालन, व्यापार-व्यवसाय शामिल था। उस समय सिन्धु प्रदेश काफी उपजाऊ था। उन दिनों सिन्धु नदी को सिन्धु प्रदेश का वरदान समझा जाता था। यहाँ लोग गेहूँ, जौ, राई, मटर आदि की खेती करते थे। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और कालीबंगा में अनाज भंडारण के प्रमाण मिले हैं।
पशुपालन सिन्धु सभ्यता के लोगों का कृषि के बाद दूसरा मुख्य पेशा था। बैल, भैंस, बकरियाँ, भेड़े तथा सुअर पाले जाते थे। सिन्धु सभ्यता के लोगों के पास उन वस्तुओं के कच्चे माल की कमी नहीं थी, जिनका वे निर्माण करते थे। उनकी कोई मुद्रा नहीं थी सम्भवतः उनका व्यापार वस्तुओं के आदान-प्रदान पर आधारित था। व्यापार नौकाओं तथा बैलगाड़ियों द्वारा होता था। हड़प्पा के लोग राजस्थान, अफगानिस्तान तथा ईरान के साथ व्यापार करते थे। मेसोपोटामिया से प्राप्त लिखित विवरणों से पता चलता है कि उनका मेलुहा के साथ व्यापारिक संबंध था जो सिन्धु प्रदेश का ही एक प्राचीन नाम है।
34. भारत में कृषि के व्यवसायीकरण पर प्रकाश डालें।
Ans – कृषि के व्यवसायीकरण का अर्थ होता है कृषि उत्पादन में उन फसलों को अधिक उपजाना जो व्यवसाय में कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं जैसे कपास, गन्ना, जूट आदि। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजी सरकार द्वारा भारतीय कृषि का भी व्यवसायीकरण किया गया। अंग्रेजों को जब अमेरिका से कपास की आपूर्ति ठप हो गई तो वह भारत में कपास उत्पादन को प्रोत्साहित किया। यहाँ के किसान बड़े पैमाने पर कपास की खेती करने लगे तथा इंग्लैंड स्थित बड़े-बड़े सूती कारखानों के लिए कच्चा माल के रूप में कपास इंग्लैंड जाने लगा।
भारत में कृषि के व्यवसायीकरण का सबसे दुखद पहलू यह है कि इससे भारतीय किसानों की हालत और दयनीय हो गई। वे कर्जदारों, सूदखोरों के चंगुल में फँस गए। भारतीय कृषि का व्यवसायीकरण भारतीय किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजी कारखानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए की गई थी। भारतीय किसानों को मजबूरीवश कपास की खेती करनी पड़ती थी। कपास के उत्पादन लागत की कीमत से भी कम कीमत पर कपास अंग्रेजों के एजेंट द्वारा खरीदा जाता था। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति और दयनीय हो गई। कपास की खेती के लिए कर्ज लेकर किसान दिनोंदिन कर्जदारों के चंगुल में फँसते चले गए।
भारत में कृषि के व्यवसायीकरण से यहाँ के कुटीर उद्योगों में प्रमुख बुनकरी उद्योग भी नष्ट हो गई। बुनकरों को कच्चा माल के रूप में कपास मिलना बंद हो गया। सारा कपास इंग्लैंड निर्यात किया जाने लगा। इससे भारत में बेरोजगारी, भूखमरी की समस्या उत्पन्न हो गई।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारत में कृषि का व्यवसायीकरण भारत के लिए अभिशाप साबित हुआ। किसान, बुनकर बेरोजगार हो गए। इससे सिर्फ अंग्रेजों को फायदा हुआ।
35. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कैसे हुई? इसके उद्देश्य क्या थे?
Ans – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के पूर्व कलकत्ता एवं अन्य स्थानों में कुछ राजनीतिक संगठनों की स्थापना हो चुकी थी परंतु इन सभी संगठनों का स्वरूप क्षेत्रीय था। अखिल भारतीय स्तर पर संगठन की स्थापना की दिशा में पहला सक्रिय प्रयास एक अवकाश प्राप्त अंग्रेज अधिकारी ए० ओ० ह्यूम द्वारा किया गया। वे भारत में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध बढ़ते असंतोष से चिन्तित थे। वे सशस्त्र संघर्ष की संभावना को टालना चाहते थे। अतः वे ‘सुरक्षा कपाट’ के रूप में कांग्रेस की स्थापना करना चाहते थे। वहीं भारतीय इस बात से सशंकित थे कि अगर वे अपनी कोई राजनीतिक संगठन बनायेंगे तो उन्हें सरकार का कोपभाजन बनना पड़ेगा, जबकि किसी अंग्रेज द्वारा स्थापित संस्था को अंग्रेजी सरकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसलिए भारतीयों ने कांग्रेस की स्थापना में ह्यूम को सहयोग दिया। इस प्रकार भारतीय नेताओं के सहयोग से 5 दिसम्बर, 1885 को ह्यूम ने इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की घोषणा की।
कांग्रेस का उद्देश्य-
(1) देश सेवा में लगे सभी व्यक्तियों के बीच घनिष्ठता और मैत्री का विकास करना।
(ii) जातियता, प्रांतीयता या धार्मिक भावना से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करना।
(iii) राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर शिक्षित वर्गों के विचारों को अभिव्यक्त करना।
(iv) आगामी कार्यक्रमों की रूप रेखा निश्चित करना।
इस प्रकार कांग्रेस का जन्म भारत में ब्रिटिश शासन के दुश्मन के रूप में नहीं, अपितु मित्र के रूप में हुआ था।
36. मुगलकालीन प्रशासन का वर्णन कीजिए।
Ans – मुगलकालीन शासन प्रणाली अति केन्द्रीकृत व्यवस्था पर आधारित थी, जिसकी धुरी मुगल सम्राट था। राज्य के सारे मामले सम्राट के इर्द-गिर्द घुमा करते थे। फिर भी शासन कार्य में सहयोग करने के लिए एक मंत्री परिषद थी। मंत्री-परिषद के सदस्य राजा की इच्छा तक ही अपने पद पर रह सकते थे। मंत्री परिषद का प्रधान वजीर (प्रधान मंत्री) होता था।
वजीर के अन्तर्गत राजस्व एवं वित्तीय मामलों का दायित्व था। दूसरा प्रमुख मंत्री मीर बख्शी, जिसपर सेना के प्रशासन एवं संगठन की जिम्मेवारी थी। तीसरा मंत्री सद्र थे, जो धार्मिक एवं न्याय विभाग का प्रमुख था। चौथा-मीर सामान थे ये मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिनके जिम्मे राज्य के कारखाने और भंडारगृह थे। इसी कारखाने से शाही आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती थी।
अकबर केन्द्रीय प्रशासन को सिद्ध करने के पश्चात प्रान्तीय प्रशासन की ओर ध्यान दिया और पूरे साम्राज्य को 12 सूबों में विभाजित कर दिया। सूबेदार सूबे के सबसे बड़े अधिकारी होते थे और इनकी नियुक्ति सीधे सम्राट द्वारा की जाती थी। सूबा सरकार या जिला में विभाजित था। सरकार का सबसे बड़ा अधिकारी फौजदार होता था और यह सूबेदार के निर्देशन में कार्य करते थे। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई परगना थी इसके अन्तर्गत कई गाँव होते थे और इस परगने में तीन महत्त्वपूर्ण अधिकारी होते थे-शिकदार, आमिल और कानूनगो। परगनों के अन्तर्गत गाँव थे और गाँवों में व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेवारी ग्राम प्रधान की होती थी, जिन्हें खुद, मुकद्द्म, चौधरी कहा जाता था।
इस प्रकार मुगल शासन प्रणाली केन्द्रीय सरकार से लेकर गाँव तक पूरी तरह व्यवस्थित थी।
37. शेरशाह के प्रशासनिक सुधारों का विवेचना करें।
Ans – शेरशाह के शासन प्रबंध को जानने के लिए निम्न तथ्यों का अध्ययन आवश्यक है-
(1) केन्द्रीय शासन-राज्य की समस्त शक्तियाँ शासक के हाथों में होती थीं। राज्य के काम को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसको भिन्न-भिन्न विभागों में बाँट दिया गया था। प्रत्येक विभाग का काम एक मंत्री के हाथ में होता था जिसकी सहायता के लिए कर्मचारी होते थे।
(ii) प्रान्तीय शासन – शेरशाह ने अपने राज्य को 47 सरकारों (प्रान्तों) में बाँट रखा था। ‘सरकार’ का मुख्य अधिकारी शिकदार कहलाता था। प्रत्येक सरकार कई परगनों में बँटी होती थी। परगने भी कई छोटी-छोटी इकाइयों में बँटे हुए थे। जिनका प्रबंध पंचायतें करती थीं।
(iii) भूमि सुधार- शेरशाह ने सारी कृषि भूमि की नाप करवाकर, किसानों से लगान उपज का 1/3 भाग लिया।
(iv) सैनिक सुधार-शेरशाह स्वयं सैनिकों की भर्ती करता था तथा उन्हें राज्य के प्रति निष्ठा की शपथ दिलवाता था। उसने सैनिकों का हुलिया (चेहरा) लिखने और घोड़े दागने की प्रथा चलाई जिससे कि युद्ध के समय अयोग्य और निकम्मे सैनिक और खराब नस्ल के घोड़े न प्रवेश पा सकें।
(v ) न्याय और पुलिस व्यवस्था- वह बिना जाति, धर्म, वर्ण या वर्ग भेद के न्याय करता था। दण्ड व्यवस्था कठोर थी। दण्ड देने में वह अपने पुत्र को भी नहीं छोड़ता था।
(vi) सड़कें देश की अर्थव्यवस्था, सैनिकों की गतिविधियों, यात्रियों और व्यापारियों की सुविधा के लिए बड़ी-बड़ी सड़कों का निर्माण कराया तथा सरायें भी बनवाई गईं।
निष्कर्ष : शेरशाह और अकबर में पहले के किसी भी शासक से कानून-निर्माण और प्रजा की भलाई की भावना अधिक थी।
38. औरंगजेब की दक्षिण नीति की विवेचना करें।
Ans – अपने शासनकाल के अंतिम 25 वर्ष औरंगजेब ने दक्षिण में निम्नलिखित उद्देश्यों को प्राप्त करने में लगा दिये।
(ⅰ ) औरंगजेब सुन्नी मुसलमान था तथा वह शिया राज्यों पर अपना अधिकार करना चाहता था। बीजापुर और गोलकुण्डा पर अधिकार करना अपना कर्तव्य समझता था।
(ii) मराठों को रोकना भी उसकी नीति का प्रमुख अंग था। उस समय मराठे शिवाजी के नेतृत्व में हिन्दू-राज्य की स्थापना का प्रयास कर रहे थे जो की सुन्नी औरंगजेब के लिए असहनीय था।
दक्षिण नीति के परिणाम :
(i) मुगल साम्राज्य अत्यधिक विस्तृत हो गया था जिससे औरंगजेब को दक्षिण विजय के लिए दक्षिण में रहना पड़ा। इस कारण शासन-व्यवस्था शिथिल पड़ गयी।
(ii) लेनपुल के अनुसार, “गोलकुण्डा और बीजापुर को विजय करने के बाद औरंगजेब स्वयं को दक्षिण भारत का स्वामी समझने लगा परन्तु दक्षिण की इन दोनों शक्तियों का विनाश करने से दक्षिण प्रायद्वीप पर उस समय जो कुछ भी व्यवस्था और अनुशासन बना हुआ था सब नष्ट हो गया और मराठों को अपना शक्ति बढ़ाने का सुअवसर मिल गया।
(iii) दक्षिण राज्यों के लगातार संघर्ष से मुगल साम्राज्य कमजोर व जर्जर हुआ ही साथ ही राजकोष रिक्त हो गया और सरकार दिवालिया हो गयी।
(iv) 25 वर्षों तक दक्षिण में रहने के कारण उत्तरी भारत में अनुशासनहीनता तथा अव्यवस्था उत्पन्न हो गई।
(v) औरंगजेब के दक्षिण में रहने के कारण उत्तर भारत में सिक्खों, सतनामियों तथा जाटों ने विद्रोह करने आरंभ किये।
(vi) दक्षिण भारत में रहने के कारण विद्रोही राजपूतों का दमन नहीं कर सका।
(vii) लगातार युद्धों के कारण खेती उजड़ गयी, उद्योग धंधे नष्ट हो गये तथा व्यापार चौपट हो गया।
(viii) दक्षिण के युद्धों के कारण कला और साहित्य का विकास रुक गया।
(ix) औरंगजेब के अत्याचारों ने मराठों में राष्ट्रीय भावना विकसित की। इसी भावना के कारण औरंगजेब मराठों को अपने अधीन नहीं कर पाया।
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